भारत में पशुपालन के क्षेत्र: प्रमुख पालतू पशु, गाय, बैल, भैंस, बकरियां, भेड़े, ऊंट, आदि की संपूर्ण जानकारी

भारत में पशुपालन के क्षेत्र: प्रमुख पालतू पशु, गाय, बैल, भैंस, बकरियां, भेड़े, ऊंट, आदि की संपूर्ण जानकारी – भारत वर्ष के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के साथ शु पालः करना सामान्य तथ्य है परन्तु कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिसमें पुपालन जनसंख्या का महत्वपूर्ण व्यवसाय है आज भी अनेकों जातियाँ अपना जीवन पशुओं के चारण, पालन के आधार पर चला रही है। भारत के पशुपालन के महत्वपूर्ण क्षेत्र निम्न है:-

भारत में पशुपालन के क्षेत्र


 (1) हिमालय पर्वतीय प्रदेश : यहाँ उत्तराखण्ड (कुमाँऊ व गढ़वाल), हिमाचल प्रदेश (कांगड़ा, कुल्लु घाटी एवं शिमला, जम्मू और कश्मी), हिमालय की तराई, असम व पूर्वोत्र भारत के राज्य आदि राज्य सम्मिलित है। यहाँ पहाड़ी भाग के कारण भेड़-बकरियाँ मुख्य पालतू पशु हैं। जिनसे उत्तम किस्म की शव्वेत रंग की ऊन प्राप्त होती है। इन क्षेत्रो में परटयनों की निनर्त दृदिधि से दूध की माँग बढ़ने से दुध पशुपालन व्वसाय में वृद्धि हिई है।


 (2)) उत्तरी पश्चिमी जलवायु क्षेत्र : यह प्रमुख पशु मेखला थार मरूस्थल व इसके चारों ओर शुष्क व अर्ध शुष्क भागों में फैली है। अल्य वृष्टि के कारण कृषि के स्थान पर पशुपालन प्रमुख व्यवसाय है। इसमें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्य प्रदेश गुजरात के पश्चिमी भाग सम्मिलित है। सिंचित क्षेत्रों में गुहेँ उत्पादन होता है और गेहूँ का भूसा चारे के लिये काम में लिया जाता है। वर्षा ऋतु में बोये गये ज्वार-बाजरा और प्राकृतिक चारे से पशु पाले जाते हैं। यहाँ मुख्यत ऊँट, भेड़, बकरियाँ, गायें, घोड़, खच्चर, गधे पाले जाते हैं। 


(3) पूर्वी एवं पश्चिमी तट क्षेत्र : इसमें पूर्वी उत्त प्रदेश बिहार, पश्चिमी बंगाल, असम, उड़ीसा, आन्ध प्रदेश, पूर्वी तमिलनाड़, केरल की पश्चिमी समुद्र तटीय पेटी सम्मिलित है। पर्याप्त वर्षा और आवश्यक तापमान के कारण चावल प्रमुख फसल हैं। चावल की पुआल (डण्ठल और चरी मुख्य चारा है। भैंस के दूध प्राप्ति तथा भैंसों से कुषि कार्य किया जता है। 

(4) मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रः इसमें दक्षिणी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिमी आंध्र प्रदेश, पश्चिमी तमिलनाडु, कर्नाटक एवं पूर्वी महाराष्ट्र सम्मिलित है। कम वर्षा के कारण ज्वार-बाजरा मुख्य फसल है। यह भारत का प्रमुख भेड़ पालन क्षेत्र है। किन्तु घटिया किस्म की ऊन प्राप्त होती है। नलकूप और सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में उन्नत नस्ल की गायें व भैंस पाई जाती हैं। 


प्रमुख पालतू पशु
 किसी समय पशु सम्पदा में समुद्ध भारत में कई कारणों से यहाँ पालतू पशुओं की संख्या लगातार घट रही है। 2007 में 52.97 कुल पशु संख्या करोड़ थी, वह घटकर पाँच साल बाद 2012 में 51.21 करोड़ रह गई है। 

(1) गाय-बैल : मानव आदिमकाल से गाय-बैल पालन कार्य करता रहा है। भारत में गाय और बैल को समाजन-जीवन एवं धार्मिक कार्य में महत्चपूर्ण स्थान प्राप्त होने का कारण, इनकी कृष़ि एवं मानव के लिए उपयोगिता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह प्रमाणित हो चुका है कि भारतीय नस्ल की गायों का दूध सर्वश्रेष A2 वर्ग का है। भारत का विश्व में गाय-बैल पालन में ब्राजील के बाद द्वितीय स्थान है, जिनकी संख्या लगभग 19.09 करोड़ है। जो विश्व  की कुल संख्या का 12.7 प्रतिशत है। यहाँ सर्व्र गाय, बैल पाले जाते हैं। जिनकी कई नस्लें हैं। विविध और उतम स्वास्यवर्धक पदार्थों की प्राप्ति, पौष्टिक एवं कम वसायुक्त होने से गाय का दूध स्वास्थ्य के लिये अमुत तुल्य पेय पदार्थ है।

 (2) भैंसे  : गाय की तुलना में भैंस अधिक दूध देती है। यह अधिक वसायुक्त, पौष्टिक और गाढ़ा होता है। विश्व में भारत का भेंस पालन में प्रथम स्थान है। भारत में 10.89 करोड भैंसे पाली जाती है, जो विश्व की 56.7 प्रतिशत है। ठंडक एवं अधिक जल की आवश्यकता के कारण अधिकांश भैंसे आदर प्रदेशों में पाली जाती हैं। उत्तर प्रदेश, आंध् प्रदेश और महाराष्ट्र प्रमुख भैंसे पाल्क राज्य हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसढ़ बिहार, झारखण्ड और तमिलनाडु में भी भैंसे पाली जाती है। मुर्, जाफरावादी, भदावरी, सूरती नीली, मेहसाना, देशी आदि प्रमुख नस्लें है। 


(3) बकरियां : भारत में बकरी को गरीब की गाय कहा जाता है। बकरियाँ दूध व माँस के लिये पाली जाती है। बकरी प्रतिदिन एक से तीन लीटर तक दूध दे देती हैं। बकरी का रख-रखाव खर्च कम व वंश वृद्धि बहुत शीघ्र होती है। इसकी मैंगनी उत्तम प्राकृतिक खाद है। भारत में 13.52 करोड़ से अधिक बकरियाँ पाली जाती है, जो विष्व की 14.5 प्रतिशत हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाड़, आन्ध प्रदेश और झारखण्ड प्रमुख बकरी पालन राज्य हैं । बकरी पालन माँस के उद्देश्य से अधिक किया जाता है। 

(4) भैड़े: भैड़े शुष्क, अर्ध शुष्क और पहाड़ी भागों में जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन है । भेड़ को ऊन व माँस दोनों के लिये पांला जाता है। भेड़ से कुछ मात्रा में दूध भी प्राप्त किया जाता है। विश्व में भेड़ पालन में भारत का चीन के बाद द्वितीय स्थान है। यहाँ लगभग 6.51 करोड़ भेड़ें पाली जाती हैं । भारत की 60 प्रतिशत भेंड़े राजस्थान, आन्ध प्रदेश और तमिलनाड़ में पाली जाती है। शेष मध्यप्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में पाली जाती है । भारतीय भेड़ों की ऊन घटिया किस्म की होने से इसे गलीचा ऊन कहा जाता है। अच्छी किस्म की ऊन, ईरान, अफगानिस्तान, मध्य एशिया, नेपाल व आस्ट्रेलिया से आयात की जाती है। 


(6)ऊँट:- रेगिस्तान का एक अति महत्वपूर्ण एवं उपयोगी पशु है। गददीदार पैर रेत में नहीं हैँसते के कारण जँट रेगिस्तान में तेज गति से दौड़ सकता है। पेड़ों के पत्ते व झाड़ियाँ खाकर अपना पेट भर लेता है। मलमूत्र गाढ़ा व चमड़ी मोटी होने के कारण पसीना कम आने से ऊँट को जल की आवश्यकता कम होती है। ऊँट के कुबड़ में एकत्रित चर्बी से जल पूर्ति कर लेने से यह सात दिन बिना पानी पिये रह सकता है। इसलिये गर्म व शुष्क भागों में आसानी से पाला जा सकता है। यह भारी बोझ ढो सकता है और एक दिन में 50 किमी तक चल सकता है। ऊँट में वर्षो बाद भी मार्ग याद रखने की अद्भुत क्षमता होती है। रेतीले मरुस्थल में परिवहन के साधन के रूप में ऊँट का कोई विकल्प नहीं है। इसलिये ऊँट को ‘रेगिस्तान का जहाज’ कहा जाता है। 


रेगिस्तान में ऊँट की उपयोगिता के कारण ही सैनिक दुकडियाँ सवारी वे बोझा ढोने के लिये ऊँट का उपयोग करती है। ऊँट सवारी करने के अतिरिक्त हल जोतने, बोझा ढोने, कुओं से पानी खींचने व गाड़ी खींचने में काम आता है। ऊँट के बालों से रस्सियाँ, कम्बल, दरियाँ व मड़े से काठी, थैले, तेल रखने की कुष्पियाँ और जुतियाँ बनाई जाती है। इसका दूध पीने के काम आता है। भारत में ऊँटों की संख्या लगातार घट रही है। भारत में विश्व के 2.4 प्रतिशत ऊँट पाले जाते हैं। यहाँ कुल 4 लाख ऊँटो में से 50 प्रतिशत से अधिक अकेले राजस्थान में पाले जाते हैं । शेष पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में पाले जाते हैं। भारत में एक कूबड़वाला और अरब देशों में दो कूबड़ वाला ऊँट पाया जाता है।


(6) अन्य : भारत का घोड़े, खच्चर, ट्टू, गधे, सूअर मुर्गी, याक पालन में भी महत्वपूर्ण स्थान है। 

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