मानव भूगोल का विकास: प्राचीन काल, मध्यकाल, आधुनिक काल, आदि की संपूर्ण जानकारी

मानव भूगोल का विकास: प्राचीन काल, मध्यकाल, आधुनिक काल, आदि की संपूर्ण जानकारी – पृथ्वी की सतह पर पर्यावरण के साथ अनुकूलन व समायोजन की प्रक्रिया तथा इसका रूपांतरण मानव के अभ्युदय के साथ ही आरंभ हो गया था।यदि हम मानोगे वातावरण की पारस्परिक क्रिया से मानव भूगोल के प्रारंभ की कल्पना करें तो इसकी जड़ें इतिहास के संदर्भ में अत्यन्त गहरी है। अतः मानव भूगोल के विषयों में एक दीर्घ कालिक सांत्य पाया जाता है। समय के साथ विषय को स्पष्ट करने वाले उपागमों में परिवर्तन आया है। यह विषय की परिवर्तनशील प्रकृति को दर्शाता है। अध्ययन की दृष्टि से मानव भूगोल के विकास को तीन युगों में विभक्त किया जाता है।

 
(1). प्राचीन काल- प्राचीन काल में विभिन्न समाजों के बीच अन्योन्य क्रिया न्यून थी। एक टूसरे के बारे में झ्ञन सीभित था। तकनीकी विकास का स्तर निम्न था तथा चारों तरफ प्राकतिक वातावरण की छाप थी। ‘भारत, चीन, मिश्र, यूनान व रोम की प्राचीन सभ्यताओं के लोग प्राकतिक शक्ियों के प्रभाव को मानते थे। वेदों में सुर्य, वाया अग्नि, जल, वर्षा आदि प्राकृतिक त्वों को देवता मानकर पूजा अर्चना की जाती थी। यूनानी दार्शनिक थेल्स व एनैक्सीमेंडर ने जलवायु वनस्पति व मानव समाजों का वर्णन किया। अरस्तू ने वातावरण के प्रभाव की वजह से ठण्डे प्रदेशों के मानव को बहादुर परन्नु चिंतन में कमजोर बताया जबकि एशिया के लोगों को सुस्त पर चिंतनशील बताया। इतिहासकार हैराडोट्स ने घृमक्कड़ जातियों तथा स्थायी कृषक जातियों के जंवन पर वातावरण के प्रभाव का जल्लेख किया। हिकटियस ने विश्व के बारे में उपलक्ध भौगोलिक ज्ञान को व्यवस्थित रूप में रखने के कारण उन्हें भुगोल का जनक कहा जाता है। स्ट्रेबो व उसके समकालीन रोमन भूगोलवेत्ताओं ने मानव व उसकी प्रगति के स्तर पर भु- पारिस्थितिकीय स्वरूपों के प्रभाव को स्पष्ट किया। 

मानव भूगोल का विकास

(2). मध्यकाल -इस काल में नौ चालन सम्बन्धी कशलताओं व अन्वेषणों तथा तकनीकी ज्ञान व दक्षता के कारण देशों तथा लोगों के विषय मे मिथक व रहस्य खूलने लगे। उपनिवेशीकरण और व्यापारिक रुचियों ने नये क्षेत्रों में खोजों व अन्वेषणों का विश्व झञानकोषिय विवरण प्रकाश में आया। इस काल में अन्वेषण, विवरण व प्रादेशिका विश्लेषण पर विशेष जोर रहा । प्रादेशिक विशलेषण में प्रदेश के सभी पक्षों का विस्तृत वर्णन किया गया। मत यह था कि सभी प्रदेश पूर्ण इकाई व पुथ्वी के भाग है। इस प्रदेशों की समझ पृथ्वी को पूर्ण रूप में समझने में सहायता करेगी। 

(3). आधुनिक काल -इस काल की शुरूआत जर्मन भुगोलवेत्ताओं हम्बोल्ट, रटर, फ्रोबेल, पैशेल, रिचथोफेन व रेटजेल ने की। फ्रांस में मानव भुगोल का सबसे अधिक विकास हुआ। रेटजेल, विडाल-जी-ला-ब्लांश,  मार्तोन, डिमांजियाँ व फ्रे्वे नें मानव भुगोल पर कई ग्रंथ लिखे। अमेरिका व ग्रेट ब्रिटेन में भी मानव भूगोल का तेजी से विकास हआ। अमेरिका में एलन सैम्पल, हटिंगटन, बौमेन, कारल्ल सॉवर, व्रिफिफथ टेलर एवं ब्रिटेन में हरब्सन, मैकिण्डर, रॉक्सयी तथा फलुअर  ने मानव भूगोल के विकास में विशेष योगदान दिया। 20वीं सदी में मानव भूगोल का विकास सभी देशों में हुआ। 


फ्रेडरिक रेटजेल जिन्हें आधुनिक मानव भूगोल का संस्थापक कहा जाता है ने मानव समाजों एवं पुथ्वी के धरातल के पारस्परिक सम्बधों के संश्लेशणात्मक अध्यन पर जोर दिया। इस काले के प्रिम्भिक दौर में मानव वातावरण सम्ब्धों का नियतिवादी, संभववादी व नवनियतिवादी विचारधाराओं के अनुसार अध्यन किया गया। नियतिवाद में प्रकति व संभवाद में मानव को अधिक प्रमावी माना । 21वीं सदी के आरम्म में नव नियतिवाद के अनुसार दोनों के पारस्परिक सम्बन्धों में सामंजरस्य पर जोर दिया गया यह विचार धारा रूको व जाओ’ के नाम से भी जानी जाती है। नवनियतिवाद के प्र्वतक प्रिफिव्थ टेलर थे।


 1930 के दशक में मानव भुगोल का विभाजन ‘सांस्कतिक भूगोल एवं आर्थिक भूगोल के रूप में हुआ। विशेषीकरण की बढ़ती प्रवृति के कारण मानव भुगोल की अनेक उप-शाखाओं जैसे राजनैतिक भूगोल, सामाजिक भूगोल, चिकित्सा भूगोल का उद्भव हुआ। 
दोनों विश्व यूद्धों के मध्य की अवधि में क्षेत्रीय विभेदन के अध्यनों पर विशेष ध्यान दिया गया। दितीय विश्वयृद्ध के बाद के दो दशको में मानव भूगोल की विषय वस्तू में स्थानिक संगठन उपागम द्वारा विभिन्न मानवीय क्रियाओं के प्रतिरूपों की पहचान करना रहा था।
 मात्रात्मक क्रांति से उत्पन्न असंतृष्टि के चलते 1970 के बाद मानव भुगोल में अनेक दार्शनिक विचारधाराओं का प्रभृत्व रहा। मानव कल्याण परक विचारधारा का सम्बन्ध लोगों के सामाजिक कल्याण के विभिन्न पक्षों से हैं। इसमे स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास जैसे पक्ष शामिल है। क्रांतिकारी विचारधारा ने निर्धनता के कारण, बंधन और सामाजिक असमानता के लिए मार्र्स के सिद्धान्त का अनुसरण किया। समकालीन सामाजिक समस्याओं का सम्बन्ध पूँजीवाद के विकास को माना।

आचरणपरक विचारधारा के अनुसार मनुष्य आर्थिक क्रियाएँ करते समय हमेशा आर्थिक लाभ पर ही विचार नहीं करता बल्कि उसके अधिकांश निर्णय यथार्थ पर्यावरण की अपेक्षा मानसिक मानचित्र (आचरण पर्यावरण ) पर आधारित होते है। विचारों में बदलाव आंशिक रूप से विश्लेषण के मापदण्डो में परिवर्तन के कारण आते है। 20वीं सदी में मानव भूगोल में सामान्य निकाय सिद्दान्त तथा मानवीय दशाओं की व्याख्या करने वाले वैश्विक सिद्दान्तों की उपादेयता पर प्रश्न उठने लगे है। अब अपने आप में प्रत्येक स्थानीय संदर्भ की समझ के महत्व पर जोर दिया जा रहा है। इस प्रकार मानव भूगोल निरन्तर विकास के साथा गतिशील भी रहा है। समय के साथ इसका महत्व, अध्ययन क्षेत्र की व्यापकता व अंन्य विषयों के साथ सम्बन्ध बढ़ रहे हैं । आज ‘भूगोल की महत्वपूर्ण इस शाखा का अध्ययन सम्पूर्ण विश्व में किया जा रहा है। 

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