इतिहास के स्रोत के रूप में वंशावलियां: पुरातात्विक स्त्रोत, मृदभांड औजार व उपकरण, अभिलेख, सिक्के व मुद्राएं, स्मारक व भवन, सिक्कों से प्राप्त जानकारी, मूर्तियां सेल चित्रकला व अन्य कलाकृतियां, आदि की संपूर्ण जानकारी

इतिहास के स्रोत के रूप में वंशावलियां: पुरातात्विक स्त्रोत, मृदभांड औजार व उपकरण, अभिलेख, सिक्के व मुद्राएं, स्मारक व भवन, सिक्कों से प्राप्त जानकारी, मूर्तियां सेल चित्रकला व अन्य कलाकृतियां, आदि की संपूर्ण जानकारी- भारतीय इतिहास में वंश लेखन परम्परा का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। वंशावली लेखन परम्परा व्यक्ति के इतिहास को शुद्ध रूप से सहेज कर रखने की प्रणाली है । यह एक ऐसी परम्परा है जिसमें वंशावली लेखक हर जाति-वर्ग के घर-घर जाकर प्रमुख लोगों की उपस्थिति में संक्षेप में सुष्टि रचना से लेकर उसके पूर्वजों की ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक घटनाओं का वर्णन करते हुये उस व्यक्ति का वंश क्रम हस्तलिखित पोथियों में अंकित करता है | वंशावलियों के अध्ययन से ही हमें जानकारी मिलती है कि हमारे पूर्वज कौन थे ? वंशावली लेखकों में मुख्य रूप से बड़वा, जागा, रावजी एवं भाट, तीर्थ पुरोहित, पण्डे, बारोट आदि प्रमुख है । ऐतिहासिक स्रोत की दृष्टि से वंशावलियाँ निम्नांकित बिन्दुओं की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण हैं-

(1) पुरोहितों द्वारा निर्मित वंशावलियाँ या बहियाँ प्रामाणिक दस्तावेजी न्यायिक साक्य्य के रूप में मान्य है। इसमें पारिवारिक सम्ब्धों के विषय में कागज इत्यादि पर वर्णन किया जाता है। इसका उद्देश्य उनके सदैव रिकार्ड के रूप में रखने का होता है। वर्णन में अक्षरों के साथ ही चिह्हों का भी प्रयोग करते हैं । मौखिक साक्षय से लिखित साक्ष्य अधिक प्रभाव पूर्ण होता है । निश्चित रूप से बहियाँ या वंशावलियाँ, एक न्यायिक दस्तावेज है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के अनुसार वंशावलियों बहियों इत्यादि को सुसंगत न्यायिक तथ्य के रूप में स्वीकार किया गया है। जगदीश प्रसाद बनाम सरवन कमार AIR 2003 P& H मामले में न्यायालय ने पण्डों की बहियों में की गई प्रविष्टियों को साक्ष्य के रूप में ग्रह्य माना। ऐसे कई मामले हैं जिसमें वंशावलियों व बहियों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया है। 

इतिहास के स्रोतhttps://rbse.co.in/genealogies-as-a-source-of-history/ के रूप में वंशावलियां


(2) वंशावली लेखको को लोक इतिहासकार भी कह सकते हैं। पुरातन एवं मध्यकालीन भारतीय इतिहास लेखन में वंशावलियाँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत रही हैं। हमारे पुरातन ग्रन्थ पुराणों में जो इतिहास उपलब्ध है उसमें वंशावलियों का महत्वपूर्ण आधार रहा है। कई ऐतिहासिक घटनाओं के प्रमाण वंशावलियों से मिलते हैं।
(3) वंशावलियों में प्रत्येक जाति व प्रत्येक व्यक्ति के इतिहास का लेखन हुआ है। उनके वंशानुक्रम की जानकारी हमें वंशावलियों से मिलती है। वंश लेखकों ने जातीय सामाजिक इतिहास की भी जानकारी दी है। समाज जिन महापुरूषों को अपना आदर्श मानता है, उनकी जानकारी भी हमें वंशावलियों से प्राप्त होती है। वंशावली लेखन परम्परा की शुरूआत वैदिक ऋषियों द्वारा समाज को सुसंगठित एवं सुव्यवस्थित करने की दृष्टि से की गई थी, जो हजारों वर्षों से आज भी अनवरत् जारी है। वंशावली परम्परा के हस्तलिखित ग्रन्थों से अनेक ऐतिहासिक पुरुषों का परिचय प्राप्त होता । 

(4) समाज के आर्थिक जीवन के विकास, लोगों के व्यवसाय आदि का उल्लेख भी वंश लेखकों द्वारा किया गया है । वंशावली लेखक एक निश्चित समय तक व्यक्ति के आवास पर ही निवास करके इसका लेखन करता था । इसलिए उसमें यथार्थता दिखाई पड़ती है।

 (5) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परम्परा, संस्कृति, मूल निवास, विस्तार, वंश, कुलधर्म, कुलाचार, गोत्र व पूर्वजों के नाम प्राप्त करने का सर्वाधिक विश्वनीय स्तोत वंशावलियाँ ही हैं। 

(6) वंशावलियों द्वारा धर्मान्तरित हिन्दुओं को अपनी जड़ों का परिचय देकर आपसी विद्देष को कम किया जा सकता है। इसे धार्मिक उन्माद और अलगाववाद को कम करके देश में साम्प्रदायिक सहयोग और सदभाव की भावना को बढ़ावा मिल सकता है। पुराणों में भी जो पाँच लक्षण (विषय) बताए गए हैं, उनमें वंश रचना व वंशानुचरित प्रमुख लक्षण के रूप में अंकित है।           सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मनवन्तराणि च ।          वंशानुचरितम चैव पुराणं पंच लक्षणामू ।। 
अर्थात् सुष्टि का सृजन, प्रलय का आगमन, वंशों की रचना, काल अवधि गणना एवं वंशचरित की चर्चा करना। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वंशावलियों के माध्यम से हमें इतिहास के महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी मिलती है। आज भी वंशावली लेखक घर घर जाकर इनका वाचन करते हैं ।
(2) पुरातात्विक सोत प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत पुरातात्विक स्रोत हैं। पुरात्व का तात्पर्य अतीत के अवशेषो के माध्यम से मानव क्रिया-कलापों का अध्ययना करना है। हडप्पा-मोहनजोदड़ो के उत्खनन से भारतीय सभ्यता व संस्कृति का प्रारम्भ 6,000 ई, पू, से 5000 ई. पूर्व तक पीछे चला गया। कलिंग नरेश खारवेल की जानकारी हाथी गुम्फा अभिलेख से ही मिलती है। इतिहास के भौतिक साक्ष्य इन्हीं स्ोतों में है। पुरातात्विक स्तोतो का विभाजन निम्नानुसार किया जा सकता है
 (1) उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष (2) अभिलेख (3) सिक्के व मुद्राएं (4) स्मारक व भवन (5) मूर्तियाँ, शैलचित्र कला व अन्य कलाकुतियाँ आदि। 

(1) उत्खनन से प्राप्त अवश्ष मृद्भाण्ड, औजार व उपकरण) पाषाणकालीन मानवीय संस्कुति व सभ्यता के बारे में जानकारी के लिए उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष ही मुख्य स्रोत हैं। प्राप्त औजारों एवं मुदभाण्डों (मिटी के बर्तन) से हम भारत में मानव की विकास यात्रा को समझ सकते है। सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की जानकारी उत्खनन से प्राप्त साग्री पर ही आधारित है। प्रारम्भ में तो पाषाण उपकरण अधिक प्राप्त हुए। जब मृदभाण्ड का मानव उपयोग करने लगा तो सर्वाधिक मात्रा में इनके अवशेष मिले हैं । इतिहासकारो के अनुसार प्राचीन भारत में चार मृद्भाण्ड संस्कृतियाँ विद्यमान रही हैं (1) गेरूए रंग युक्त मृदभाण्ड संस्कृति (Ochre coloured Pottery or OCP संस्कृति) 
(2) काले व लाल मुदभाण्ड परम्परा (Black & Red Ware orBRW संस्कृति 
(3) चित्रित स्लेटी रंग की मुद्भाण्ड संस्कृति (Painted Grey  ware or PGW संस्कृति) 
(4) उत्तरी काली चमकीली परम्परा North (Black Painted Ware or NBPW संस्कृति ) 
उत्खनन में सड़कें, नालियाँ, भवन, ताम्बे व कांस्य सामग्री, औजार, बर्तन, आभूषण आदि पुरावशेष मिले हैं, जिसे तत्कालीन मानव समाज व संस्कति की जानकारी मिलती है। (2) अभिलेख भारतीय पुरास्ोत में अभिलेखों का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। तिथियुक्त एवं समसामयिक होने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से इनका महत्व अधिक है । शासन विशेष के तिथिक्रम एवं उपलब्धियों की जानकारी इन अभिलेखो से ही मिलती है। स्थानाभाव के कारण इसमें अनावश्यक सामग्री भी नहीं मिलती । इनमें सम्बन्धित शासक व व्यक्तियों के नाम, वंश, तिथि, कार्य व समसामयिक घटनाओं आदि का उल्लेख होता है। जैसे अशोक के अभिलेख, खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, गौतमीपुत्र सातकर्णी का नासिक अभिलेख एवं प्रयाग प्रशस्ति के बिना प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी अधूरी है। अशोक के अमिलेख खरोष्ठी एवं ब्राहमी लिपि में है। अशोक के शिलालेख, स्तम्भ लेख और गुहालेख तीनो प्रकार के अभिलेख मिलते हैं। अशोक के अभिलेख कला के भी उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये अभिलेख लम्बे-कलात्मक स्तम्भ व शिलाओं पर उत्कीर्ण हैं। जूनागढ़ का रूद्रदामन का शिलालेख भी काफी प्रसिद्ध है। स्तम्भ लेखों में अशोक के अलावा चन्द्र का मेहरोली स्तम्भ लेख, स्कन्द गुप्त का भीतरी स्तम्भ लेख, समुद्रगप्त का प्रयाग स्तम्भ लेख प्रमुख है । ताम्र लेख से गुप्तो के इतिहास की जानकारी मिलती है। प्रभावती गुप्ता का ताम्र लेख विशेष उल्लेखनीय है। गूहालेखों में अशोक के बराबर गुहालेख, दशरथ के नागार्जुनी गुहालेख, सातवाहनों के नासिक व नानाघाट गुहालेख अधिक उपयोगी है। कई मुर्तियों के भी शीर्ष या अधोभाग में शासकों ने लेख लिखवाए हैं, जिनसे उनके बारे में जानकारी मिलती है। ये मूर्ति लेख कहलाते हैं । इन अभिलेखों के द्वारा विभिन्न शासको के समय की महत्वपूर्ण घटनाओं तथ्यों की जानकारी के साथ ही आर्थिक सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक जानकारियां मिलती हैं। 
(3) सिक्के व मुद्राएँ 
प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी में सिक्कों मुद्राओं व मोहरों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है । इनसे शासकों के नाम, तिथियाँ, चित्र, वंशपरम्परा, धर्म, गौरवपूर्ण कार्यों, कला, शासक की रूचि आदि की जानकारी मिलती है। गुप्तकालीन सिक्कों से में महत्वपूर्ण सूचनाएं मिलती हैं । समुद्रगुप्त के वीणा वादक व व्याघ्र निहन्ता सिक्के उसकी संगीत के प्रति रूचि व शौर्य को प्रदर्शित करते है ।

इतिहास के स्रोत के रूप में वंशावलियां

इसी प्रकार कुमारगुप्त के कार्तिकेय प्रकार के सिक्के उसके शैव अनुयायी होने की पुष्टि करते है। सिक्कों से शासकों केराज्य विस्तार, उनके आर्थिक स्तर, धार्मिक विश्वास, कला, विदेशी व्यापार आदि की जानकारी मिलती है। सबसे पहले प्राप्त होने वाले सिक्के चाँदी व तँबे के हैं। इन पर केवल चित्र है। इन्हे पंचमार्क या आहत सिक्के कहा जाता है। मौर्यों के बाद हिन्द यूनानी शासकों ने लेख युक्त मुद्रा प्रारम्भ की। कुषाणों के समय स्वर्ण व ताम्र सिक्कें प्रचलन में आए। गुप्त काल में स्वर्ण व रजत मुद्रा चलन में थी। सिक्कों पर राजा का नाम, राज चिह्, धर्म चिह व तिथि अंकित होती थी। कृछ विशेष घटनाओं की जानकारी भी सिक्को से मिलती है। समुद्र गुप्त के सिक्कों पर अश्व व यूप के चिह है व अश्वमेध पराक्रम लिखा है, इससें समुद्र गुप्त द्वारा अश्वमेघ यज़् किए जाने की जानकारी मिलती है। इसे एक सिक्के पर उसे वीणा बजाते हुये दिखाया है । बयाना (राजस्थान) व जोगलथम्बी (नासिक) से सिक्को का ढेर मिला है। जोगलथम्बी के सिक्को से शक सातवाहन संघर्ष की जानकारी मिलती है। गौतमीपुत्र ने शकों के सिक्कों पर अपना नाम अंकित करवाकर सिक्के जारी किये। सिक्कों के साथ ही मुहरें भी प्रचलित थी । इन पर राजा, सामन्त, पदाधिकारीगण, व्यापारी या व्यक्ति विशेष के हस्ताक्षर व नाम होते थे। बसाढ़ (प्राचीन वैशाली) से 200 मिट्टी की मुहरें मिली है।
सिक्कों से प्राप्त जानकारी :
 -तिशिक्रम निर्धारण -धार्मिक विश्वास की जानकारी -कला पर प्रकाश -व्यापार व आर्थिक स्तर की जानकारी -साम्राज्य की सीमाओं का ज्ञान -नवीन तथ्यों का उदघाटन -शासकों की रुचियों का ज्ञान 
(4) स्मारक व भवन
पुरातात्विक स्रोतों के अन्तर्गत भूमि पर एवं भूर्भ में सि्थित सभी अवशेष, स्तूप, चैत्य, विहार, मठ, मन्दिर, राजप्रसाद, दुर्ग व भवन सम्मिलित हैं। इससे उस समय की कला, संस्कृति व राजनैतिक जीवन की जानकारी मिलती है। मोहनजोदड़ो ब ह़ष्या के अवशेषों से हमें वहां की सस्यला ब संस्कृति की जानकारी मिलती है। देवग़ व भीतरीगांव मन्दिर से गुप्तकालीन धार्मिक व सांक्कृतिक अवस्धा की जानकारी मिलली हैं। समारकों से ही दक्षिणी पूव्ी एशिया में भारलीय स्कृति के विस्तार की जानकारी मिलली है। क्बोडिया के अंगकोर्वाट के स्मारक, जावा के बरोबुदूर क भन्दिर भारत का अंच्य देशों में औपनिवैशिक ब सार्कृतिक विस्तार की कहानी कहते है। (5) मूर्तिया, शैलचित्र कला व अन्य कलाकृतियां– उत्खनन में अनेक स्थानों से विभिन्न मूर्तियाँ, टेराकोटा की कलाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं जो हमें उस समय के धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन की जानकारी देती हैं। इसके अलावा चित्रकला मानव जीवन को प्रमाणिक रूप से अभिव्यक्त करने का मुख्य साधन है। प्रागौतिहासिक काल में अनेक शैलाश्रय (प्रारम्भिक मानव का निवास स्थान) में तत्कालीन मानव द्वारा चित्रांकन किया गया है, जिसे शैलचित्र कला कहा जाता है। इनमें जीवन के विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति चित्रों के माध्यम से की गयी है। इनसे प्रारम्भिक मानव के सांस्कृतिक, सामाजिक, व धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती है। दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान, उत्तरी राजस्थान, शेखावाटी क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में ऐसे शैलचित्र मिले हैं । मध्य प्रदेश का भीमबेटका, व पचमढी भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है । इसी प्रकार अजन्ता की चित्राशि, दुर्गो व महलों के भित्तिचित्र भी प्राचीन भारतीय इतिहास की अभिव्यक्ति करते हैं । 

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