हिंदी साहित्य संपूर्ण इतिहास: हिंदी शब्द की उत्पत्ति, हिंदी भाषा का उद्भव और विकास, आदि की संपूर्ण जानकारी

हिंदी साहित्य संपूर्ण इतिहास: हिंदी शब्द की उत्पत्ति, हिंदी भाषा का उद्भव और विकास, आदि की संपूर्ण जानकारी- हिंदी भारत में सर्वाधिक बोले जाने वाली भारतीय आर्य भाषाओं मैं सर्वाधिक लोकप्रिय है। भारतर्ष को प्राचीन काल में आर्यावर्त के नाम से जाना जाता था और यहाँ के निवासियों को आर्य तथा आर्यं द्वार बोले जाने वाली भाषाओं को आर्य भाषाओं के नाम से जाना जाता था। पृथ्वी के मानचित्र में भारत की स्थिति एक प्रायद्दीप के समान है। इसके उत्तर में हिमाच्छादित हिमालय तथा सुद्र दक्षिण में अथाह अपार सागर हिलोरें ले रहा है, जिसकी महान संस्कृति ने वैदिक संस्कार, सदाचार एवं सुव्यवस्थित सुदूढ़ सामाजिक परम्पराओं को जन्म दिया है। सहिष्णुता भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा गुण है। जो समुद्र की भाँति अनेक नदियों की धाराओं को अपने अन्दर धारण करने की क्षमत रखती है। यहाँ अनेक जाति धर्म के लोगों ने आक्रमण किया, किन्तु सब मिट गए और भारतीय संस्कृति आज भी अमिट है। यह संस्कृति हमारी परम्पराओं को नवजीवन प्रदान करती है, जिसके फलस्वरूप आज भी यह नवनूतन लगती है। यहाँ राजनीतिक सामाजिक एवं आर्थिक सभी परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव आए, किन्तु इसकी सहिष्णुता की नीति से यह सदैव विजयी रही है। हिन्दी साहित्य में भक्तित, वीर और श्रंगार का त्रिवेणी संगम दृष्टिगोचर होता है। इसमें भक्ति की धारा के संग ओजस्वी शैली के रासो साहित्य तो कहीं महाकवि बिहारी की नायिका का अद्भुत श्रूंगार और कहीं घनानन्द के वियोग भरे कवित्त के साथ-साथ भूषण का राष्ट्र्रेम उजागर होता है। भारत की इस पावन भूमि में धर्म, संस्कृति और संस्कारों की अजस्र धारा प्रवाहित होती है, जो जनजीवन को अमुृतमय जीवन प्रदान कर रही है। यहाँ के कवि लेखक स्वान्तसुखाय के साथ-साथ परिजन हिताय साहित्य का सुजन करते हैं । कवियों में तुलसी, सूर, जायसी और कबीर अपनी वाणी से जनसमूह को भक्ति और प्रेम की धाराओं से आन्दित करते हैं तो भारतेन्दु, प्रेमचन्द और जयशंकर प्रसाद अपने साहित्य के द्वारा राष्ट्र्रेम को अभिव्यक्त करते हैं । इस प्रकार के गौरवान्वित साहित्यकारों पर हम भारतीयों को गर्व है क्योंकि साहित्य को ‘सुरसरि सम सब कर हित होई ” बताया जाता है । 

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हिन्दी शब्द की व्यृत्पत्ति – हिन्दी शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा के “सिन्धु” शब्द से मानी जाती है । सिन्धु नदी के आस-पास का क्षेत्र सिन्धु प्रेश कहलाता था । ईरान (फारस) की तरफ से भारत में आने वाले विदेशी आक्रमगकारी हिन्दुकुश पहाड़ी मार्ग को पार करके जब सिन्धु प्रदेश में आए तो उन्होंने सिन्धु प्रदेश को हिन्द प्रदेश कहा; क्योंकि ईरानी (फारस) भाषा में शब्द की प्रथम ‘स’ ध्वनि को ‘हा ध्वनि में उच्चारित करते हैं । अतः सिन्धु प्रदेश को हिन्प्रदेश कहने लगे और वहाँ के निवासियों को सिन्धु के स्थान पर हिन्दु कहने लगे। यही सिन्धु की भाषा हिन्द कहलाने लगी और आगे चलकर ईरानी भाषा का ईक प्रत्य लगने के कारण हिन्द स ईक -हिन्दीक बन गया जिसका अर्थ हिन्द का हुआ । यही शब्द धीरे-धीरे परिवर्तित होकर हिन्दीका हुआ जो अंग्रेजी भाषा के रूपांतरण के कारण इंडिया बन गया। आज यह इंडिया समस्त भारतवर्ष का सूचक बन गया है।

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हिन्दी भाषा का उदभव और विकास – भारतीय भाषा का प्राचीनतम ग्रंध ऋग्वेद है । ऋगवेवद की भाषा संस्कृत थी, किन्तु समयचक्र सदैव गतिमान होने के कारण परिवर्तनशील है. । अतः भाषा भी धीरे-धीरे अनेक रूपों में परिवर्तित होने लगी । संस्कृत भाषा का समय 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व का रहा | यह दो प्रकार की थी । पहली वैदिक संस्कृत जिसमें वेद, उपनिषद, आरण्यक, ब्राह्वण एवं दर्शन आदि की रचना हुई व दूसरी लौकिक संस्कृत जिसमें रामायण और महाभारत इत्यादि की रचना हुई । यही लौकिक संस्कृत बोलचाल की भाषा के रूप में विकसित हुई और धीरे-धीरे पाली भाषा के रूप में प्रचलित हुई । जिसका समय 500 ईसा पूर्व से ईसा की पहली शताब्दी तक माना गया। इस भाषा में बौद्ध धर्म के विनयपिटक, सूतपिटक, अभिधम्मपिटक एवं जातक कथाओं की रचना हुई, किन्तू भाषा के दो रूप सदैव प्रचलित रहे । पहला रूप साहित्यिक, दूसरा लौकिक अर्थात् बोलचाल की भाषा । लौकिक भाषा में धीरे-धीरे साहित्यिक रचनाएँ होने लगती हैं । जब कोई भाषा कवि और लेखकों का आश्रय पाकर नवीन भाषा में परिवर्तित हो जाती है तो साहित्यिक भाषा का रूप घारण कर लेती है । पाली भाषा में भी ऐसा ही हुआ । वह समय के अनुसार प्राकृत का रूप धारण करने लगी । प्राकृत का समय ईसा की पहली शंताब्दी से लेकर फ० ईस्वी के बाद तक रहा । इस काल में जैन साहित्य प्रचुर मात्रा में रचा गया । प्राकृत के समय जनपदों में क्षेत्रानुसार भाषा का प्रचार हुआ । यहीं से प्राकृत भाषा अप्रंश के रूप में प्रसारित हुई। विद्वानों ने प्राकृत भाषा के अन्तिम चरण में अप्रंश का उद्भव माना है क्योंकि तत्कालीन प्रचलित शब्दों से यह पता चलता है। कि प्राकृत के उत्तराद्ध में शब्दों में विकृति (बिगड़ना) आना शुरू हो गया । जैसे गाथा शब्द गाह और दोहा शब्द दूहा के रूप में परिवर्तित हो गए। अपभ्रंश के समय देशी भाषायुक्त थोड़ी सरलत एवं मधुरता वाली भाषा का भी अभ्युदय हुआ उसे अवहट्ठ” भाषा कहने लगे । मैथिल कोकित विद्यापति ने इसी भाषा में अपनी दो रचनाएँ लिखी। पहली “कीर्तिलता’ और दूसरी “कीर्तिपताका ये दोनों अवहट्ठ की कृतियाँ हैं ।

 जैसे :-  देसिल बअना सब जन मिठा ।  ते तैसन जपहो अवहट्ठा ।। 

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अप्ंश भाषा के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों एवं बोलियों से ही हिन्दी भाषा का उद्भव हुआ ।। अप्रंशभाषी कवियों एवं दार्शनिकों, सिद्धाचार्यो, जैनाचार्यो एवं नाथ समुदाय के अनुयायियों से ही अप्रंश भाषा का प्रचार एवं प्रसार हुआ । हर्वर्द्धन के शासन काल के पश्चात अप्रंश का प्रचार तेज गति से बढ़ा । अतः हिन्दी का प्रारमभिक काल अपर्भ्रश साहित्य में ही दिखाई दिया। इसी काल के चौरासी सिद्धों में हिन्दी का रूप निखर करके आया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी को ग्राम्य अपभ्रंश का विकसित रूप माना है। तत्कालीन सिद्धाचार्यों ने लोक भाषा में ही लिखना प्रारम्भ किया, क्योंकि कोई कविता या काव्य रचना जनभाषा में लिखने से ही बहुश्रुत बनती है और ख्यांति प्राप्ति करती है अपभ्रंश भाषा के हेमचन्द्राचार्य ने सबसे पहले अंप्रशंश भाषा का व्याकरण “शब्दानुशासन” लिखा, किन्तु हेमचन्द्राचार्य से पूर्व ही सिद्धारा्या ने अपनी चनाएं प्रस्तुत कर दी थीं । अप्रंश भाषा का इतिहास बताता है कि हिन्दी अपभ्रंश के आँचल में पली बढ़ी। यही प्रारभ्भिक हिन्दी की बुनियाद हैं उदयनारायण तिवारी ने लिखा, आचार्य हेमचन्द्र के पश्चात उवीं शताब्दी के प्रारम्भ में आधुनिक भारतीय भाषाओं के अभ्युदय के समय ाडवीं शताब्दी के पूर्व तक का काल संक्रान्ति काल था। जिसमें भारतीय आर्य भाषाएँ धीरे-ीरे अपर्रंश की स्थिति को छोड़कर आधुनिक काल की विशेषताओं से युक्त होती जा रही थीं। मिश्रबंधुओं ने अपने “मिश्रबंधु विनोद’ में हिन्दी साहित्य के आदिकाल की विवेचना करते हुए अप्रंश के साहित्य को प्रधान स्थान दिया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में अप्रंश और प्राकत की अन्तिम अवधारणा से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव माना। डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है, देश धीरे-धीरे इतना बढ़ा कि १उवीं सदी तक आते-आते अप्रंश के सहारे से ही पूर्व और पश्चिम के देशों ने अपनी बोलियों का स्वतंत्र रूप प्रकट कर लिया । इसके भौगोलिक परिप्रेष्षय को देखें तो लगता है हिन्दी का क्षेत्र दो भागों में बँट गया । प्रथम पशचिमी हिन्दी और द्वितीय पूर्वी हिन्दी । अप्रंश का साहित्य हिन्दी के जन्म का कारण बना । हिन्दी साहित्य की परम्परा को देखें तो डॉ. नगेन्द्र के अनुसार अपभ्रंश से ही क्षेत्रीय रूपों में परिवर्तित होने वाली बोलियों से हिन्दी का रूप विकसित हुआ है । अप्ंश अर्थात शौरसेनी अप्रंश, पैशाची, ब्राचड़, महाराष्ट्री, मागधी और अर्धमागधी के रूपों में प्रसारित हो रही थी। इनकी उप्भाषाएँ एवं मुख्य बोलियों से ही हिन्दी का उद्भव माना गया है। जिसका सामान्य परिचय इस प्रकार है । अपभ्रंश की क्षेत्रीय भाषाएँ जिनसे हिन्दी का उद्भव हुआ:- 1. शौरसेनी अपभ्रंश 2. मागधी अपभ्रंश 3. अर्धमागधी अप्रंश शौरसेनी अप्रंश की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ ।

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उपभाषाएँबोलियां   1. पशचमी हिंदी     बोलियाँ खड़बली (कौरवी),ब्रजभाषा,  बुन्देली हरियाणवी (बांगरू), कन्नीजी 2. पूर्वी हिंदी            अवधी, बधेली, छतीसगढी
 3. राजस्थानी, मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी
 4. पहाड़ी ,पश्चिमी पहाड़ी, मध्यवर्ती पहाड़ी
 5. बिहारी,मैथिली, मगही, भोजपुरी इस प्रकार हिंदी में पाँच उपभाषाएँ और अठारह बोलियाँ सम्मिलित हैं। 


(1). खड़ीबोली – पश्चिमी हिन्दी की बोलियों में पहला स्थान खड़ी बोली का है । प्राचीन काल में हस्तिनापुर में कौरव वंश का शांसन होने से इसको (कौरवी) भी कहते हैं। दिल्ली, गाजियाबाद, देहरादून, मुरादाबाद, संहारनपुर के आस पास के क्षेत्र में यह बहु प्रचलित बोली रही इसमें लोक नाटक, कहानी, लोककाव्य व गीत आदि की रचनाएँ हुई । यह देवनागरी लिपि में लिखी जाने लगी। मध्यकाल में आते-आते इसमें अरबी , फारसी के शब्द भी सम्मिलित हो गए और यह हिस्दुस्तानी के नाम से जानी गई । इसमें संस्कृत की तत्सम शब्दावली का बाहुल्य है। यह ठेठ हिंदी- क्री सबसे निकट की बोली है। वर्तमान में हिन्दी काव्य इस खड़ी बोली में ही लिखा जा रहा है। 


(2). हरियाणवी –  हरियाणा प्रदेश की बोली होने के कारण इसे हरियाणवी कहते हैं । यह चंडीगढ़ के आस-पास पटियाला, अम्बाला, हिसार व रोहतक के क्षेत्र में बोली जाती है । कहीं-कहीं इसमें पंजाबी भाषा का पुट भी आ गया; क्योंकि यह पंजाब प्रान्त के निकट है । यहाँ के लोक साहित्य में यह बहुत प्रचलित है, इसे ग्रामीण क्षेत्र में  बांगरू के नाम से भी जाना जाता हैl 


(3). कन्नौजी – कानपुर के आस-पास का क्षेत्र कन्नौज प्रदेश कहलाता है। इसका प्रमाः कानपुर, पीलीभीत, इटावा, शाहजहाँपुर, फर्रूखाबाद व हरदोई क्षेत्र में है । ब्रज भाषा के शब्दों के समान शब्द एवं बोलने का लहजा होने कारण इसको ब्रज जैसी ही समझते हैं ; किन्तु यह ब्रज भाषा से भिन्न है । यहाँ कान्यकु्जी ब्राह्मणों का बाहुल्य था। इसलिए इसे कन्नौजी भी कहते हैं।


 (4). ब्रजभाषा – ब्रज मण्डल मथुरा वृन्दावन की प्रमुख बोली होने के कारण इसे ब्रज भाषा कहते हैं । शौरसेनी अप्रंश का मध्यर्ती रूप इसमें झलकता है, क्योंकि शूरसेन प्रदेश की यह प्रमुख बोली रही है। ब्रज का क्षेत्र विस्तार विशाल है-आगरा, अलीगढ़, बरेली, मथुरा, एटा, मैनपुरी, घोलपुर व भरतपुर आदि इस क्षेत्र में आतेहैं। हिन्दी जगत में ब्रज का साहित्य अधिक लोक प्रिय होने कारण यह लोगों में बहु प्रचलित है। सूरदास, न्दास, केशव, बिहारी, धनानन्द, पदमाकर देव तथा अष्टछाप व अन्य कवियों की रचनाएँ इसी ब्रजभाषा से मंडित है। यह मन को मोहने वाली मीठी बोली होने के कारण जनप्रिय हो गई ।

 
(5). बुन्देली -बुन्देल राजाओं के बुन्देल खण्ड की बोली होने के कारण इसे बुन्देली कहते है। इसका प्रदेश ओरछा, झांसी, छतरपुर, सागर, ग्वालियर, होशंगाबाद व हम्मीरपुर के आस पास का क्षेत्र है। बुन्देली में लिखी गई “आल्हा खण्ड’ एक सुप्रसिद्ध रचना है । उसकी ओजस्वी शैली मन में जोश भर देती है, “आल्हा” की शब्दावली बुन्देली से काफी मिलती-जुलती है ।


(6). अवधी – पूर्वी हिन्दी की बोलियाँ में सबसे पहला स्थान अवधी का है । यह अयोध्या के आस-पास की बोली है । अयोध्या का वर्तमान नाम अवधप्रदेश है । तुलसी की ‘रामचरितमानस’ अवधी की प्रसिद्ध कृति है । इसका प्रसार अयोध्या, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, सीतापुर, फैजाबाद व बाराबंकी आदि क्षेत्रों में हैं। तुलसी और जायसी इस भाषा के प्रसिद्ध कवियों में गिने जाते हैं ।। सूफी कवियों की रचनाएँ अवधी में ही रची गई हैं। जैसे : मुल्लादाऊद की चन्दायन, कुतबन की मृगावती, मंझन की मधुमालती व जायसी की पदमावत । ये रचनाएँ अवधी में ही रची गई हैं।


 (7). बघेली – रीवा क्षेत्र में कभी बधेल राजाओं का साम्राज्य रहा था । इसलिए इसे बधेल खण्ड के नाम से जानते हैं और. यहाँ बोले जाने वाली बोली को बघेली कहते हैं । अर्धमागधी अप्रंश की पूर्वी हिन्दी से इसकी उत्पत्ति मानते हैं। यह रींवा, सतना, मेहर, नागौद व जबलपुर में बोली जाती है । कुछ भाषा वैज्ञानिक इसे अवधी की एक उपबोली मानते हैं । 

8 छत्तीसगढ़ी– मध्यप्रदेश का कुछ हिस्सा छतीसगढ़ कहलाता है । इसे अलग राज्य का दर्जा भी मिल गयी है । यह बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग. काकेर एवं नंदगाँव के आंस-पास बोली जाती है । छतीसगढ़ का लोकसाहित्य अपने आस-पास के अंचल में ही प्रचलित है । इसका कोई विशिष्ट साहिव्य उपलब्ध नहीं है ।


(9). मारवाडी – (पश्चिमी राजस्थानी) राजस्थान प्रदेश के पश्चिम क्षेत्र में मारवाड़ी के नाम से बोली जाती है । जैसे- जोधपुर, फलोदी, जैसलमेर, बीकानेर, नागौर, पाली, सिरोही, अजमेर व किशनगढ़ के कुछ हिस्से तक यह बोली जाती है। लोकसाहित्य में मीरा के पद तथा रासो साहित्य (डिंगल भाषा मे) पाया जाता है ।

 (10). जयपुरी – (ढूंढाड़ी) राजस्थान के पूर्वी भाग जयपुर, टोक, डिग्गी, मापुरा, किशनगढ़ आदि में इसे ढूंढाड़ी कहते हैं। इसकी एक शाखा हाड़ौती के नाम से जानी जाती है, जो झलावाड़, कोटा, बारा (हाडौती क्षेत्र) में बोली जाती है । इसमें लोक साहित्य भी प्रचुर मात्रा में मिलता है । 

(11). मेवाती – उत्तरी राजस्थान में मेव जाति के इलाके में यह प्रतिनिधि बोली है । इस प्रदेश को मेवात क्षेत्र भी कहते हैं । इसका विस्तार अलवर, ‘भरतपुर, गुड़गाँव व करनाल आदि में हैं । मेवात प्रदेश की बोली होने के कारण इसे मेवाती कहते हैं । इसकी एक मिश्रित बोली भी है। जिसे अहीरवाटी भी कहते हैं ।

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(12). मालवी – राजस्थान के दक्षिणी भाग मालवा प्रदेश में यह मालवी के नाम से जानी जाती है । इसका क्षेत्र उदयपुर, चितौड़गढ़, मध्यप्रदेश की सीमा से लगे इन्दौर, रतलाम, भोपाल, देवास, होशंगाबाद तथा उसके आस-पास का क्षेत्र है। शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली का लोक साहित्य पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है । 


(13). भोजपुरी – बिहार राज्य के भोजपुर क्षेत्र के आधार पर इस बोली का नामकरण किया गया । इसका विकसित रूप बनारस, शाहाबाद, आजमगढ़, गोरखपुर, बलिया, मिर्जापुर जौनपुर, चम्पारण व सारण के आस-पास का क्षेत्र है। इसका मुख्यतः लोक साहित्य मिलता है, किन्तु हिन्दी जगत् के सितारे भारतेन्दू हरिश्चन्द्र, प्रेमचन्द व जयशंकर प्रसाद इसी क्षेत्र के रहने वाले थे । 

(14).मगही – बिहार के मगध प्रदेश की बोली होने के कारण इसका नाम मगही है । मागधी अपभ्रंश की यह विकसित बोली है । यह पटना, भागलपुर, हजारीबाग, गया, पलामू, के आस-पास बोली जाती है । इसमे लोक साहित्य बहुत लिखा गया है। (15). मैथिली – यह मागधी अपभ्रंश की विकसित बोली है । इस का क्षेत्र मिथला प्रदेश होने के कारण इसे मैथिली कहा गया । यह दरभंगा, पूर्णिया, मुंगेर व मुजफरपुर में बोली जाती है। | यहाँ का साहित्य बहुत सम्पन्न है । यह वाणी मधुरता के कारण बहुत भीठी है । विद्यापति जैसे कवि यहाँ के रसिद्ध कवि थे । गोविन्दास, हरिमोहन झा तथा रणजीत लाल इसके प्रसिदध साहित्यकार रहे हैं। 


(16).पश्चिमी पहाडी – यह शौरसेनी अप्रंश की. विकसित बोली है । यह हिमाचल प्रदेश में शिमला, मण्डी, ध्र्मशाला व अम्याला के आस-पास के क्षेत्र मे बोली जाती हैं। 

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