हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रयोजन, स्त्रोत, लेखन की परंपरा, हिंदी भाषा पर सांस्कृतिक प्रभाव, राजनीतिक प्रभाव सामाजिक स्थिति का प्रभाव, आदि की संपूर्ण जानकारी

हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रयोजन,

हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रयोजन, स्त्रोत, लेखन की परंपरा, हिंदी भाषा पर सांस्कृतिक प्रभाव, राजनीतिक प्रभाव सामाजिक स्थिति का प्रभाव, आदि की संपूर्ण जानकारी – साहित्य के इतिहास लेखन का मूल प्रयोजन साहित्य की प्रवृत्तियों एवं उसकी उपलबिय को जनता तक पहुँचाना है। उसके आन्तरिक और बाह्य संघर्ष की गाथा को सरल व सुबोध भाष में वर्णित करना है। साहित्य की प्रेक शक्तियों के साथ आन्तरिक भाव सामन्जस्य बिठाना है त। जीवन को गति प्रदान करने वाले साहित्य की समाज में क्या भूमिका है, उसे बतलाना ए राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों का दिग्दर्शन कराना साहित्य इतिहास का प्रयोजन होता है। इतिहास शब्द ‘इति’ और ‘हास’ से बना है, जिसका अर्थ है “ऐसा-ही-था’ यदि साहित्य के इतिहास को साहित्यिक दिग्दर्शन कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा, क्योंकि यह वर्तमान और अतीत के पक्षों को उजागर करता है और हिन्दी साहित्य के इतिहास में हिन्दी का मूल उद्गम और उसके क्रमिक विकास को समझाता है । साहित्य का इतिहास अपने विकास क्रम का अध्ययन करता है और समाज का ध्यान केन्रित करता है । साहित्य का कालक्रम, नामकरण उसमें योगदान देने वाले कवि- लेखकों का सहयोग व तत्कालीन परिस्थितियों का अध्ययन करता है, जो समाज के लिए अतिआवश्यक है, क्योंकि उसके द्वारा विकास क्रम के सोपानों और स्तरों को आसानी से समझ सकते हैं। तत्कालीन कवियों की काव्य कला व भाषा शिल्प से परिचय होता है, जो आगामी पीढ़ी के लिए प्रणादायक है। अतः साहित्य का इतिहास कवि एवं लेखकों की काल सम्बंधी विवेचना करते हुए उनकी कृतियों का भी विश्लेषण करता है । अतः साहित्य के इतिहास का मूल प्रयोजन विगत युगों की साहित्यिक प्रवृत्यियों का दिग्दर्शन करना है, क्योंकि साहित्य का इतिहास मानव की चित्वृत्तियों का चित्रण तथा समसामयिक परिवेश का विवरण प्रस्तुत करता है। जिस प्रकार समाज साहित्य को प्रभावित करता है। ठीक उसी प्रकार साहित्य भी समाज को प्रभावित करता है। इसीलिए साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है।


हिन्दी साहित्य के इतिहास के स्रात – इतिहास सदैव साक्ष्य की खोज करता है वह प्रमाणित साक्ष्य प्राप्त होने पर आगे बढ़त है। यही उसकी आधार सामग्री है। यह साक्ष्य दो प्रकार के होते हैं। पहला अन्तःसाक्ष्य टूस। बाह्य साक्षय । अन्तसाक्ष्य के अन्तर्गत उपलब्ध सामग्री में आधारभूत कृतियों एवं ग्रंथों, कवि ए लेखकों की फुटकर प्रकाशित एवं अप्रकाशित रचनाएँ होती है। बाह्य साक्ष्य के अन्तर्ग्त ताम्रपत्रावली, शिलालेख, वंशावलियाँ, जनश्रुतियां, कहावते, ख्यात एवं वचनिकाएँ जैसी सामग्री होती है। जो तत्तकालीन युग को परिलक्षित करती है। हिन्दी साहित्य में भी अंत: और बाहय स्रोतों के माध्यम से इतिहास लेखन प्रारम्भ हुआ । जिसमें गोकुलनाथ द्वारा रचित चौरासी वैष्ठवन की वार्ता और दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ताँ, नाभादास कृत भक्तमाल, धुरवदास कृत भक्त नामावली एवं सन्तवाणी संग्रह, भिखारीदास ‘कृत्त “काव्य निर्णय’ तथा अन्य कृतियाँ कविनामावली, मोदतरंगिनी, श्रंगार संग्रह, हुरिश्चन्द्र कृत ‘सुन्दरी तिलिक’ मातादीन मिश्र का “‘कवित्त रत्नाकर’ में कई कवियों की कविताओं का परिचय मिलता है। इस प्रकार अन्ते: साक्ष्य प्रकाशिंत रचनाओं एवं अप्रकाशित स्चनाओं का संग्रह होता है। बाह्य साक्ष्य के माध्यम से इतिहासकार अपनी पैनी दृष्टि से त्कालीन परिस्थितियों की खोज कर लेता है। कर्नल दॉड द्वारा फलिखा गया राजस्थान को इतिहास में। चारण कवियों का तथा काशी नागरी प्रचारिणी सभा की खोज रिपोर्ट में अज्ञात कवियों एवं लेखको का परिचय मिलता है। मोतीलाल मेनारिया ने राजस्थान में हिन्दी के हस्त लिखित ग्रंथों की खोज की तथा हिन्दूओं के धार्मिक दर्शन के सिद्धांतों को निरूपित करते हुए उस समय के कवि लेखकों एवं आचार्यो के विचारों की भी समीक्षा की है। जनश्रृतियों से तात्पर्य है जनता में प्रचलित बातें जिसमें सत्य का अंश छिपा रहता है । यह कई वर्षो तक लोगों की जीभ पर रहती है, किन्तु घीरे-धीरे लिपिबद्ध हो जाती है। उनमें कवि की जीवन सम्बन्धी घटनाओं का योग होता है तथा प्राचीन ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर उस युर का चित्रण मिलता है। इस प्रकार की आधारभूत सामग्री के मूल स्रोतों के माध्यम से ही इतिहास लेखन होता है। अत: यह लिपि बद्ध होकर एक ऐतिहासिक ग्रंथ बन जाता है। 


हिन्दी साहित्य इतिहास के लेखन की परम्परा – हिन्दी साहित्य की लेखन सामग्री प्राप्ति के पश्चात विद्वानों ने इतिहास लेखन प्रारम्भ किया। हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास लेखन का श्रेय फ्रेंच भाषा के विद्वान् को जाता है ।। इसका नाम गार्सा द तासी था । इनका “इस्तवार द ला लितरेत्युर एंदुई-ए-ऐन्दुस्तानी” नाम से 1839 में प्रथम भाग प्रकाशित हुआ तथा द्वितीय भाग 1887 में प्रकाशित हुआ । इसे अंग्रेजी के वर्णो के क्रमानुसार लिखा गया था । यह हिन्दी और उर्दू के लगभग 70 कवियों का संग्रह है । तासी ने प्रथम प्रयास में कवियों की जीवनी और उनके द्वारा रचित रचनाओं का उपलब्ध विवरण प्रस्तुत किया । यह नई दिशा की और प्रथम कदम था । इनका प्रारम्भिक प्रयास प्रशंसनीय रहा है । यह गौरवपूर्ण गाथा हिन्दी के इतिहास लेखन की परम्परा में नींव का पत्थर थी । इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए शिवसिंह सेंगर ने “शिवसिंह सरोज के नाम से 1883 में दूसरा इतिहास लिखा । इसमें लगभग एक हजार कवियों का वर्णन है । इसमें कवियों की जीवनी, जीदन सम्बन्धी घटनाएँ, चरित्रों एवं उनकी कविताओं के संग्रह को संगृहीत किया गया है । हिन्दी इतिहास लेखन का तीसरा प्रयास डॉ. जार्ज ग्रियर्सन ने “द मॉडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान’ के नाम से लिखा । यह एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल” से 1888 में प्रकाशित हुआ । इन्होंने इस इतिहास को वैज्ञानिक दृष्टि से व्यवस्थित किया । इस प्रकार का इतिहास पहली बार लिखा गया किन्तु कालक्रमबद्ध इतिहास लेखन की परम्परा की शुरुआत मिश्रबन्धुओं द्वरा की गई । यह ग्रंथ “मिश्रब्धु विनोद” के नाम से 1913 में प्रकाशित हुआ । इसमें काल विभाजन भी किया गया। इसी समय हिन्दी साहित्य जगत में एक देदीप्यमान नक्ष्त्र का अवतरण हुआ । इनका नाम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल था। इन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास को सुव्यवस्थित कालक्रमानुसार लिखा । इस इतिहास को हिन्दी साहित्य का प्रामाणिक प्रारमभ्िक ग्रंथ माना जाता है । यह नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा “हिन्दी शब्द सागर’ की भूमिका के रूप में 1929 में प्रकाशित हुआ । आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास को चार भागों में विभाजित करके इतिहास की महत्ता को बढ़ा दिया और आगामी लेखकों के लिए सीधा और सरल मार्ग तैयार कर दिया। इनका कालक्रमानुसार न्यायोचित एवं युगानुरूप इतिहास है, क्योंकि इन्होंने उपलब्ध ग्रंथों के आधार पर काल विभाजन किया । इस इतिहास में शुक्ल जी ने अपना दृष्टिकोण भी स्पषट्ट किया । उन्होंने लिखा प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्त होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीं चित्तवृ्ति की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ उनका सामन्जस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है। शुक्ल के पश्चात् हिन्दी साहित्य के परवर्ती इतिहासकारों ने भी हिन्दी जगत में अपना योगदान दिया । आचार्य हजारी प्रसाद द्वेदी ने हिन्दी साहित्य की भूमिका के नाम से इतिहास लिखा •जिसमें ऐसे तथ्यों एवं निष्कर्षों का प्रतिपादन किया जो लेखन की दृष्टि से नवीन सामग्री एवं नई व्याख्या देती है । अन्य लेखकों में डॉ. रामकूमार वर्मा ने 1938 में डॉ. नगेन्द्र . डॉ. धीरेद्द्र वर्मा तथा डॉ. नामवर सिंह इत्यादि ने अपने अध्ययन, शोधप्रबन्ध व समीक्षात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से तिहास में नवीन योगदान दिया। 


हिन्दी भाषा पर सांस्कृतिक प्रभाव -भारतवर्ष की विशाल घरा पर अनेक परम्पराओं के लोगों ने आक्रमण किया और वे यहाँ रच बस गए । उनकी परम्परा भारत की संस्कृति में मिल गई । भारत की धरती पर वैदिक धर्म के साथ बौद्धर्म व जैनधर्म का भी प्रसार हुआ । बौद्धर्म ने मनुष्य् को “जीओ और जीने दो’ की शिक्षा दीं। जैन धर्म ने इसी सिद्धान्त को ‘अहिंसा’ के नाम से अपनाया । किन्तु वैदिक धर्म न्ष नहीं हुआ । वैदिक धर्म में ब्राहमण आरण्यक, उपनिषद एवं दर्शन शास्रों की रचनाएँ हुई। न्यायदर्शन (महर्षि गौतम), योगदर्शन (महर्षि पतंजलि) वैशेषिक (महर्षि कणाद), सांख्य (महपि कपिल), पूर्व मीमांसा (महर्षि जैमिनी), उत्तर मीमांसा-वेदांत (शंकराचार्य ) तथा छः वेदांग शिक्षा कल्प, निरुक्त, छन्द ज्योतिष व व्याकरण । इन्हीं के कारण भारत विश्व में जगत् गुरु कहलाया तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय उच्च कोटि के शिक्षा केन्द्र बन गएं । वैदिक संस्कृति का पूर्ण विकास हो गया । यहीं से विश्व में सुष्टि और परमात्मा की व्याख्या दी गई । आत्मा और मा को व्यक्त किया गया। मनुष्य को सुष्टि के विकास और विनाश को समझाया गया। अज्ञान हे मिटाकर ज्ञांन के द्वारा विश्व शान्ति प्रेम और सद्भावना की शिक्षा प्रदान की गई। इसी कार भारत का अस्तित्व आज भी अमिट है । संस्कृत के आचार्यो ने सन्तों, सिद्धाचाय्यों, जैनाचार्यों त नाथ समुदाय के योगियों द्वारा जन मानस में चेतना का नवीन संचार किया । चित्व्त्तियों के सात्विक प्रवृत्तियों की ओर मार्गदर्शन किया । इसका प्रमुख श्रेय भारतीय वैदिक साहित्य में ऋे को जाता है, क्योंकि ऋगवेद की ऋचाएँ सुष्टि के तत्वों की प्रामाणिक व्याख्या प्रदान करती है। जैसेः- इन्द्र, वरुण, सूर्य, पृथ्वी, आदि को देवों की संज्ञा देकर सृष्टि के संचालन में इनके सहयो। को प्रदान करने के कारण इनकी स्तुति की गई । यह सत्य जगत-विदित है कि इन तत्वों के माध्यम से सुष्टि आभी संचालित. है। ऋरवेद हमारे साहित्य का मूल है। संस्कृत भाषा से पाली, पाली से प्राकुत, प्रांकृत से अपभ्रंश की उत्पत्ति हुई और क्षेत्रीय अपभंश भाषाओं से उपभाषाएँ एवं बोलियोँ ही हिन्दी भाषा के जल्म का कारण हैं। इस हिन्दी साहित्य पर वैदिक कालीन संस्कृत के शब्दों की अमिट छाप है। जैसे- वाल्मीकि, वेदव्यास, अश्वधोष, कालिदास, बाणभट्ट, दण्डी, भामह, भारवि, भवभूति, विश्वनाथ, जयदेव, भाघ एवं कल्हण आदि कवियों ने तथा अप्रंश साहित्य के अनेक आचारयों के काव्यों ने हिन्दी भाषा को प्रभावित किया । अब्दुल रहमान (संदेशरासक) जोइन्दु कृत (परमात्मप्रकाश), धनपालकृत (भविसयत्तकहा), पुष्यदन्त कृत (जसहरचरि), स्वयंभू कृत (पउमचरिज) मुनि रामसिंह कृत (पाहुड़ दोहा) तथा हेमचन्द्र का “शब्दानुशासन” जैसी कृतियों का हिन्दी साहित्य में अमूल्य योगदान है । राहुल सांकृत्यायन तो इस समय के सहरपा (सरहपाद) कवि को हिन्दी का पहला कवि मानते हैं।

राजनीतिक प्रभाव – हर्षवदर्धन का साम्राज्य 700 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में छि्न-भिन्न हो गया । उसके द्वारा शासित राज्यों ने अपनी सम्रभुता प्राप्त कर ली, साथ ही आक्रमणकारियों के लगातार युद्धों से भारतवर्ष की स्थिति को शोचनीय बना दिया । भारत की संगठित सत्ता पतन की ओर जा रही और उस समय इस्लाम राज्य की नींव रखी जा रही थी। आठवीं शताब्दी से पन्द्रहवीं शताब्दी तक ‘भारतीय राजनीतिक परिस्थितियाँ धीरे-धीरे क्षीण होती चली गई और इस्लामी शासक हिन्दुस्तान पर काबिज हो गए । युद्धों से आहत भारतीय जनता अपना धैर्य खो चुकी थी । विदेशी शक्तियों के आक्रमण का प्रभाव साहित्यिक क्षेत्र में पड़ने लगा। भाषा में अरबी-फारसी के शब्द आ गए। चारों तरफ अराजकता, गृह कलह, विद्रोह, आक्रमण, अशान्ति एवं निर्धनला से त्रस्त होकर मानव अपने मन को परम शक्ति परमात्मा के प्रति केन्द्रित करने लगा। इस समय तीन बातें प्रमुख थीं। कुछ व्यक्ति भौतिक सुखों से वंचित होने पर आध्यात्मिक बातें करने लगे, कुछ हिम्मत करके जी-जान से दुश्मनों से लोहा लेते हुए प्राण न्यौछावर करने लगे तथा कुछ मरते-मरते भी अपने भोग का परित्याग नहीं कर सके । इस युग में विचित्र परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई । इन परिस्थितियों के बीच चौथी पंक्ति उन लोगों की थी, जिन्होंने अपने शौर्य और बुद्धि के बल पर धैर्य को बचाये रखा। ईश्वर की लोक कल्याणकारी सत्ता में अपना विश्वास जगाए रखा । ऐसे वीर धरती के लिए गौरव बन रहे थे। उसी गौरवपूर्ण गाथा का उदय रासो साहित्य से हुआ, जिसमें आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा उनका अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन, शौर्य, वीरता एवं पराक्रम को दर्शाया जा रहा था। राजनीति एक अजीब मोड़ ले रही थी। विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को बुरी तरह नष्ट कर दिया था। जन-धन की हानि के साथ भारतीय निराशा के सागर में डूब रहे थे। 

आर्यावर्त की समृद्धि, खुशहाली एवं शक्ति से आस-पास के सीमावर्ती प्रदेश खुश नहीं थे। उनके मन-मस्तिष्क में सदैव आर्यावर्त की खुशी छीनने की योजना बनती रहती थी । यह ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाला देश विदेशियों की आँखों की किरकिरी बना हुआ था । यहाँ यवन, आभीर, हृण, कुषाण तथा मुसलमान आदि जातियाँ आई । भारत के अद्भुत शौर्य के आगे यवन पराजित हुए । किन्तु लगातार युदधों के कारण दसवीं शताब्दी तक विदेशी जातियों ने अपना आधिपत्य जमा लिया । छठीं शताब्दी में हर्षवर्धन का एक छत्र साम्राज्य रहा । चीनी यात्री हेंवनसांग जब आया तो भारत के वैभव को देखकर वह चकित रह गया । दसवीं शताब्दी में महमूद गजनवी ने भारत पर लगातार कई आक्रमण किए और भारत को लूटकर ले गया। गजनवी के बाद भारत में शहाबुदीन मोहम्मद गौरी ने आक्रमण किया । तब पृथ्वीराज चौहान और शहाबुददीन मोहम्मद गौरी का तराइन में (1191) पहला युद्ध हुआ, जिसमें गौरी पराजित हुआ, किन्तु दूसरे ही वर्ष (1192) शहाबुदीन गौरी तराइन के मैदान में फिर आ डटा और यह ‘भारत के लिए एक निर्णायक युद्ध हुआ । पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई और गौरी की विजय। इन युद्धों के कारण जनता और पिस गई थी, आर्षिक संकट से जूझ रही थी । अकाल और भुखमरी से आहत थी और सम्ाट युद्ध में व्यस्त रहते थे । गुलाम प्रथा का बोलबाला था । स्त्रयों को बाजार में खरीदा और बेचा जाता था। दास प्रथा का प्रचलन हो रहा था । गुलाम वंश से खिलजी वंश तक भारत की स्थिति दयनीय हो गई थी । अकाल और गरीबी के कारण हिन्दुओं को दुखख भोगना पड़ता था । अमीर खुसरो इसी युग के कवि थे । इन्होंने इस समय अंपनी प्रसिद्ध कृति खुसरो की पहेलियाँ लिखी –

       (1) तरवर से इक तिया उतरी, उसने बहुत रिझाया ।            बाप का उससे नामें जो पूछा, आधा नाम बताया ।। 
       (2)आधा नाम पिता पर प्यारा, बूझ पहेली गौरी ।           अमीर खुसरो यो कहे, अपने नाम न बोली निबोरी ।। 

सामाजिक स्थिति का प्रभाव – राजनीतिक परिस्थितियों के साथ सामाजिक स्थितियों में परिवर्तन आ रहा था। जनता का शासकों के प्रति विश्वास समाप्ते हो गया तो धर्म के मठाधीशों के प्रति भी निराशा ही हाथ लग रही थी। चारों तरफ असहायता एवं लाचारी नजर आ रहीं थी। ऐसे में अंधविश्वास, जातिपाँति का भेद और बढ़ गया। समाज में असामाजिकता, अत्याचार एवं अनुशासनहीनता का वातावरण फैल गया। स्त्री के प्रति और भी अन्याय होंने लगा। नारी वस्तु की भाँति खरींदी और बेंची जाने लगी। सती प्रथा, बाल विवाह तथा दास प्रथा की परम्परा ने जोर पकड़ लिया था। ढोंगी सन्त महात्मा व्यक्तियों को धर्म का भय दिखाकर ठग रहे थे। निर्धनता जनता के लिए अभिशाप बन चुकी थी। अकाल, महामारी, आक्रमण के कारण फसलों को नष्ट करना, जनता को मारना-काटना आदि बातों ने समाज को विकट परिश्थितियों में डाल दिया। गरीब-गरीब बन रहे थे और धनी धनवान बनते जा रहे थे। इस समय केवल साहित्य के द्वारा ही आशा का संचार किया जा रहा था। अपभ्रंश भाषा में साहित्य रचना हो रही थी जिसके माध्यम से धर्म, नियम एवं नैतिकता पुन समाज में अपना स्थान जमा रही थी। सातवीं शताब्दी के अंत में और आठवीं शताब्दी के प्रारभ्भ में स्थापत्य कला को बढ़ावा मिला। पल्लव शासकों ने शिल्पियों एवं चित्रकारों को सम्मान देना शुरू कर दिया । मद्रास म्युजियम के चोल ताम्रपत्र के अनुसार कांचीपुरम के बुनकरों को उनकी 

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